बाज़ार, व्यापार और गणतंत्र !

हम एक ‘गणतंत्र’ है
हमारा ‘अपना’ एक ‘मंत्र’ है,
हमारी अपनी ‘संस्थाओं’ के प्रति
हमारी ‘बेरूखी’ ‘अनोखी’ है,
इसीलिए देश में जो कुछ होता है
उसमे ‘अपने बाप का क्या जाता है’
‘होने दो जो होता है’
‘कौन किसके लिए रोता हैं’
‘यार सब चलता हैं’…

‘आबादी’ बढती है
‘नए शहर’ ‘पैदा’ होते हैं
‘ज़मीन’ के भाव कुलांचे मारते है
‘कंक्रीट-जंगल’ के दलाल खुश होते है,
‘रंग-बिरंगी’ सपने और
‘खोखली-जगमगाहट’ के ‘काम्प्लेक्स’ में
‘पर्यावरण’ और ‘प्रदुषण’ जैसे मुद्दे
‘फाइलों’ कि तरह गायब हो जाते है,
‘राजनीति’ इसीको ‘विकास’ कहती है

पर ‘कुदरत’ कहाँ
‘भेद’ करती है,
‘आपदा’ आती है
‘शहर’ डूब जाते हैं
‘इंसानियत’ ढूँढने से नहीं मिलती और
‘नीति-मूल्यों’ कि रूहें कांपती है,
‘लाचारी’ कों ‘बाज़ार’ निगलता है
रोते-बिलखते ‘मासूम’ ‘बिसात’ पर है
‘जिंदगी’ दम तोड़ रही है,
‘शेयर-बाजार’ में ‘सूचकांक’ बढ़ रहा है …

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હે કૃષ્ણ,

હે કૃષ્ણ,

સાંભળ્યું છે કે,

સદિયો પહેલા,

દ્રૌપદી ની એક ચીખ સાંભળી,

તેના ચીર પુરી,

તે ભરી સભા મા લાજ રાખી હતી.

ત્યારે..

આજે દરરોજ,

કેટ કેટ્લી દ્રૌપદીઓ ના,

વસ્ત્ર હરણ  થાય છે ત્યારે,

નિ:સહાય, લાચાર,

એ દ્રૌપદીઓની,

ચીખો નુ શુ????

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પ્રેમ

કોણ જાણે કે કેમ છે!
પણ હકીકત છે કે પ્રેમ છે.
ટક્યો છે આ સંસાર જે બળે,
એ પરિબળ પ્રેમ છે.

શ્વાસ ભરી ઉચ્છવાસ કાઢે,
જરૂરતે સ્વભાવ બદલે નહિ,
નવાજે ખુદાવિંદ છંતાય નેમતો થી,
એનો કરમ એ પ્રેમ છે.

ત્રણ પથરા પર ખાલી હાંડી,
ભૂખ્યા સંતાન ને દિલાસો,
“હમણાં બની જશે હોં!”
મજબુર માં ની આંખે ઝળઝળિયાં એ પ્રેમ છે.

વળતું ધણ,
દોહેલી ગાય,
ખાલી આંચળે વાછરું ધરાય,
નિતરતું એ દૂધ પ્રેમ છે.

હર વિપદાએ ઓર નિખર્યો,
ઠોકરે થયો મજબૂત,
બંદાની હર એક પરીક્ષા,
એ પણ ખુદાનો પ્રેમ છે.

હૈસિયતે હણાયેલા,
ઔકાતે અટવાયેલા,
આ “મુસ્તાક” ની શું વિસાત?!
છંતાયે વાંચે સાંભળે આ જ્ઞાનીઓ,
આ મૈત્રી તણો પ્રેમ છે

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जनसंख्या विस्फोट

विश्व पर्यावरण दिवस पर समाजशिल्पी के जन्मदिन पर समाजशिल्पी पर प्रकाशित काव्य:

कब यह सब महसूस किया था साथी जीवन में तुमने?
प्यार प्रकृति का पाकर कब जीवन धन्य किया तुमने?

सुबह सवेरे मुर्गे की कब बांग सुनी थी? बचपन में?
चहकती चिड़िया को सुनकर कब महक उठे थे मधुबन में?
बना ही रहता बड़ी देर तक मुह में कड़वापन सारा,
ऐसे बता कब होंठ तले दातुन दबाया था तुमने?

तृप्त हुआ कब चक्की के आटे की वह रोटी खाकर?
या फिर घर के पिछवाड़े की ताज़ी सब्जियाँ बनवाकर?
आज जो कुछ खाया उसको बोते, उगते, बढते देखा?
या फसलों को काटके ले जाते कब देखा था तुमने?

कब देखा था आसमान उस रात निराला – तारों भरा?
या देखा ढलते सूरज को? लहलहाता घास हरा?
चाँद चौदवीं का वह देख के साथ लिए और पहला प्यार
पार चलें इस दुनिया के कब ऐसा सोचा था तुमने?

छैल छबीले यारों के संग उड़ता होली का वह रंग,
या हो दीवाली की खुशियों में जब पुरे परिवारका संग,
कभी अष्टमी, ईद कभी तो, सारे मनाये मिलजुल कर,
कौन सा धर्म है, क्या है जाति, कब ऐसा पूछा तुमने?

आज प्रदुषण फैलाता है, और शांति का भंग करे,
औद्योगिक कचरे फैलाकर, वनसंपति का नाश करे,
और अस्तित्व के संघर्ष में तु नैतिकता को भूल चूका,
जनसंख्या विस्फोट का क्या होगा अंजाम सोचा तुमने?

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भारत नमो नमः !

जब कहीं ‘नयी सड़क’ बनती है,
मुझे ‘गतिशील भारत’ नज़र आता है,
जब कही ‘नया पूल’ बनता हैं
मुझे ‘अवरोध मुक्त जीवन’ कि
आशा बंधने लगती है,
जल-भराव होने वाली जगहों पर
जब नए नए ‘काज-वे’ बनते है,
मुझे बाढ़ में फंसे हुए मुसाफिर को
राहत मिलती दिखती है,
इस देश का विकास मेरा ‘जीवन-यज्ञ’ बन गया है,

जब कहीं नया उद्द्योग आकार लेता हैं,
मुझे ‘बेकारी’ की समस्या कुछ कम होने कि खुशी होती ,
जब नयी कोई परियोजना ‘मंजूर’ होती हैं ,
तो मुझे विकास कि तरफ ‘दौडता हुआ ‘भारत’ नजर आता है,
लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से मुझे सुख की अनुभूति होती है,
मुझे नव निर्माण से नयी ‘प्रेरणा’ मिलती है,
मुझे उद्योग्शील समाज से नव ‘चेतना’ मिलती है,
इस देश के संसाधनों में मेरी श्रद्धा है,

अंतरिक्ष में जब भारत नयी नयी खोज करता है,
और नए नए मक़ाम हासिल करता है,
मुझे सारा आकाश तिरंगा नज़र आता है,
बादलों के पार लगता है तिरंगा लहरा रहा हो जैसे,
गूँज रहा है नाद ‘जय हिंद’ का चारों ओर ,
मिट्टी के कण कण से उठ रही हैं ‘सुनामी’ समृद्धि की,
देश की समर्थता में मुझे विश्वास हैं,
चहूँ-ओर मुझे भारत कि पताका लहराती नजर आती है

विकास मेरे दिल कि धडकन बन गया है,
प्रगति मेरी सांस में बस गयी है,
गुजरात मेरी शिराओं में दौडता है,
और शक्तिशाली भारत मुझे दौडाता हैं,
मैं हिंदुस्तान को जीता हूँ,
मैं उठता हूँ तो इस देश की मिटटी की ताकत के साथ,
और सोता हूँ तो लेकर सपने –
समृध्दशाली, सुखी और प्रगतिशील भारत के,
सद्भावना मेरी पहचान बन गयी है,
इस देश की आन मेरी ‘जान’ बन गयी हैं,

देश के पर्यावरण कि रक्षा,
कर्त्तव्य मेरा प्रथम है,
प्रकृति में मौजूद ईश्वरीय शक्ति को
मेरा बार बार नमन है,
मुझे उत्तुंग पर्वत शिखर और अथाह सागर में
कई जन्म जीने का अनुभव होता है,
और जब नर्मदा का जल कच्छ में आता हैं
मुझे ‘भागीरथ-प्रयास’ का अर्थ समझ में आने लगता हैं,
जहां भी कोई अच्छी बात होती है
या सकारात्मकता आकार लेती है
मुझे जीवन का मर्म समझ आता है
‘मेरा जीवन’ अब ‘भारत’ है,
‘भारत’ ही अब ‘मेरा जीवन’ है !!!

(यह कविता श्री.नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी से प्रेरित है, और उनके व्यक्तितत्व, उनके विचार और उनके कार्य को समर्पित है)

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नमो भारतः !!

इसमें कोई शक नहीं रह गया हैं के देश में परिवर्तन कि लहर चल रही है. और पिछले कुछ वर्षों में उत्पन्न हुई ‘राजनितिक’ शून्यता’ और ‘वैचारिक दिवालियेपन’ से देश बाहर भी निकलना चाहता है.
इसकी शुरुवात सही मायनों में अन्ना के आंदोलन से हुई थी. और देश में एक नयी उमंग का एहसास भी हुआ था. अभी हाल के चुनावो में मतदान प्रतिशत में हुई वृद्धि कों भी हम एक अच्छा संकेत मान सकते हैं कि राष्ट्र एक नव-निर्माण कि ओर अग्रेसर होना चाहता है.

‘राष्ट्र निर्माण’ या कहिये कि ‘राष्ट्र का नव-निर्माण’ करने के साथ ही हमें ‘राष्ट्र’ कों एक ‘जीवंत-शील’ राष्ट्र बनाना है. एक नयी ‘उर्जा’ निर्माण करनी है, जिससे लगे कि पूरा देश एक ‘आत्मा’ है एक ‘अद्बुत शक्ति’ है.
इसके लिए प्रशासनिक ‘इच्छाशक्ति’ कि तो ज़रूरत हैं ही, सामान्य जनता का भी कर्तव्य बन जाता है कि वो देश कि प्रगति और समृद्धि में अपना योगदान पूर्ण समर्पण के साथ करें.
लोगों कों ये भी मान लेना चाहिए कि सब कुछ ‘सरकार’ के भरोसे ठीक नहीं हो सकता, फिर चाहे ‘प्रधानमन्त्री’ कोई भी क्यों न हो. आम जनता कों अपने कर्तव्यों कों भली भाँती समझना होगा और उसे निभाना भी होगा.
वर्षों से हमें ये सुनने कि आदत हो चुकी हैं कि ‘अपने बाप का क्या जाता है’, ‘मजबूरी का नाम..’, ‘सब चलता है..’.
इसलिए हमारे लिए जो कुछ अच्छा या बुरा होता हैं हम उसको ‘सरकार’ का किया कराया मान लेते हैं. सार्वजनिक जीवन में ‘संवेदनहीनता’ जो पराकाष्ठा कि हद पार चुकी है वो इसी का नतीजा है. दिन ब दिन हम एक दूसरे के प्रति और राष्ट्र हितों के प्रति असंवेदनशील बनते गए और बढते गए.
लेकिन अब नए सिरे से शुरुवात करने कि ज़रूरत है. और एक संवेदनशील, जिम्मेवार, राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब हम ‘चरित्र निर्माण’ से शुरू करें और अपना सामाजिक दायित्व निभाएं, देश के प्रति अपना ‘स्वामित्व’ समझे.
लेकिन हमारी प्रशासनिक कार्य प्रणाली इस तरह कि बन गयी हैं जब तक कोई ऊपर से आदेश न दे तो ‘बाबु’ लोग मानते नहीं है.
और ऐसे नेता भी नहीं रहे जो लोगों कों इतनी छोटी छोटी –मगर बेशकीमती बातें सिखाएँ और उनका मार्गदर्शन करें.
लेकिन मैं आपके सामने कुछ प्रस्तुत करना चाहता हूँ, जो आप पढ़िए और खुद ही इस नेता के बारे में अपना मन बनाईये और उनके बताए हुए नक़्शे कदम पर ज़रूर चलिए और राष्ट्र कि प्रगति में उनका साथ दीजिए.
आपने बड़े बड़े नेताओं के मुंह से बड़ी बड़ी बातें तो ढेर सारी सुनी होगी, लेकिन अब सुनिए के कैसे ‘चरित्र निर्माण’ से (जिसकी हमें सख्त ज़रूरत हैं ) ‘राष्ट्र निर्माण’ होता है;
(ये श्री नरेन्द्र मोदी जी के सन २००८ में कांकरिया तलाव के उद्घाटन समारोह में दिए गए भाषण के कुछ अंश है, इसके तीन भाग है जो यु टूब पर उपलब्ध है और जिसकी ‘लिंक’ यहाँ पर दी गयी है. जिन्हें जीवन में कुछ कर गुज़रना है और जो अपने ‘उच्चतम ध्येय कों हासिल करना चाहते वो इससे ‘सीख’ ज़रुर ले सकते है. मैनेजमेंट’ कि भाषा में कहूँ तो इसमें ‘मोटिवेशन’, ‘इंस्पीरेशन’, ‘ओवनरशिप’ और ‘सेल्फ – अक्चुव्लैजेशन’ के पाठ आप ले सकते हैं)

इन तीन भागों में जो भाग-२ हैं उसके कुछ अंश मैं अनुवाद करके (चूँकि यह भाषण गुजराती में हैं) इस लेख में जोड़ दूं उससे पहले कुछ बातों का सारांश यहाँ दिया गया हैं जो मेरे ख़याल से महत्वपूर्ण हैं .

Namo at Kankaria festival -Ahmedabad 2008 – PART – 2/3

(Bharat jodo, Ownership, ગુજરાત ગૌરવ, Make cleanliness a habbit, Vote bank politics,
Politics of development Preserve the trees, Preserve this Kankaria, Do we need Security to even preserve our Gardens and Places of Public Interest?)

(Start from 04:28 in the YT link)

भाइयों और बहनों, यह कांकरिया तलाव अपना है. यह अहमदाबाद मुनिसिपल कॉरपोरशन का नहीं. यह केवल भारतीय जनता पार्टी का नहीं, यह कांग्रेस पार्टी का भी नहीं. यह कर्णावती समग्र जनता कि है. इन सबकी मालिक जनता जनार्दन हैं. और जिसकी मालिक खुद जनता हो, हम खुद हो, तो इसको कोई खराब करें क्या हम वो बर्दाश्त कर सकते है. कोई यहाँ के संसाधनों को तोडें, जनता कि संपत्ति का नुक्सान करें, क्या हम उसे बर्दाश्त कर सकते हैं. इन सबके प्रति एक जिम्मेवारी हम सबकी हैं और ऐसा वातावरण निर्माण करने कि जिम्मेदारी भी हमारी हैं. उसकी रक्षा भी जनता को करनी चाहिए. और कोई इसे नुक्सान पहुँचाने कि हिमाकत करता हैं तो उसे रोकने के लिए भी हमें ही आगे बढ़ना चाहिए. यहाँ किसी पार्टी या किसी दल का कोई सवाल नहीं हैं. यह राष्ट्र कि संपत्ति है. यह भूमि हमारी हैं. इसकी रक्षा करना, इसका रख रखाव करना और स्वच्छता बनाए रखना हम सब का फ़र्ज़ हैं.
– जहां तक मुझे याद पड़ता हैं, शायद ही किसी नेता ने ऐसी चीज़ें कभी अपने भाषण में कही होंगी. अगर पिछले ४० वर्षों में भी किसी नेता ने ऐसी बातें कहीं हो तो जानकार और वरिष्ठ इस लेख में जोड़ सकते हैं और इसी प्रकार से किसी ने समाज प्रबोधन किया हो तो हम जनता के सामने ला सकते हैं.

Links for Part-1 and Part -3 (and the ‘highlighted’ points as I find out in them)

Namo at Kankaria festival 2008- PART – 1/3

(Continual improvement, keep moving, remove the obstacles, pollution,
Environment, Awakened citizens, cleanliness, plastics, polythene, civic sense, above party level, Living standards, Standard of living

Namo at Kankaria festival 2008- PART – 3/3

(Nirmal Gujarat)

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१२५ साल पुरानी पार्टी

(A party that would have been ‘different’)

अप्रैल ७ से लेकर मई १२ तक चले मतदान के पूरा होते ही सबको चुनावों के नतीजों का इंतज़ार है.
१६ मई कों चुनावों के नतीजों के आने के साथ ही देश में नयी सरकार के गठन कि प्रक्रिया शुरू हो जायेगी.
आम आदमी (मतलब हम सब = जनता) यही उम्मीद करता है कि जो पार्टी जीतें वो पूर्ण बहुमत से जीते और जो सरकार बने या जिसकी भी सरकार बने वो एक स्थायी सरकार हो और पांच साल वह सरकार जनता कि भलाई के लिए और जनता के कल्याण के लिए काम करे.
देश कों एक नयी प्रेरणा दे. देश कों एक नयी दिशा दे. देश कों एकात्म करें !!
देश में विकास का और भाईचारे का, चैन और अमन का वातावरण निर्माण करे.
देश में चली आ रही सड़ी गली राजनीति से ऊपर उठकर जनहित में कार्य करें और कानून का राज्य स्थापित करने में मदद करें.

२०१४ के चुनावोंके लिए मतदान शुरू होने से पहले तक सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी अपना ‘१२५ साल पुरानी पार्टी’ होने का राग अलापती रही. और सबसे पुरानी पार्टी होने कि दुहाई देती रही. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान इस बात कों उन्होंने ज्यादा तव्वजो नहीं दी या इस मुद्दे कों ज्यादा उछाला नहीं. पता नहीं क्यों?
लेकिन जब जब कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता राशिद अल्वी साहब चुनाव से पहले हर बार, अपनी खास लच्छेदार भाषा में इस बात का उल्लेख करते रहते तो मुझे बहुत पीड़ा होती थी और अब भी होती है, क्यों कि कांग्रेस १२५ साल पुरानी पार्टी होने के बावजूद भी जनता कि नब्ज़ नहीं पकड़ पायी. शासन कों प्रभावशाली बनाए रखने के लिए नए नए तरीके नहीं ढूँढ पायी.
देश में एक नव-चेतना का वातावरण निर्माण नहीं कर पायी. बल्कि लोग दिन ब दिन उदासीनता कि खायी में धंसते चले गए और ‘सरकार’ से – शासन प्रणाली से- यहाँ तक कि लोकतंत्र कि सभी ‘संस्थाओं से – उनका ‘मोह-भंग’ होता गया.

एक ऐसी पार्टी जो अपने आप कों बार बार ‘१२५ साल पुरानी पार्टी’ बता रही हो और जो करीब ६० साल तक देश में सत्ता के केंद्र में रही हो वो चाहती तो बहुत कुछ कर सकती थी.
उनके पास लीक से हटकर काम करने का पूरा मौका था. जरुरत थी तो सत्ता कि लालसा कों त्यागकर, तुष्टिकरण और जात पात कि राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में कार्य करने की. कांग्रेस ने हमेशा अपने आप कों सबसे ज्यादा ‘सेकुलर’ बताने कि कोशिश कि, और असल में कांग्रेस ने ही हमेशा कभी धर्म के नाम पर, कभी जाती के नाम पर, कभी आरक्षण के नाम पर लोगों कों बांटने कि राजनीति की.
कांग्रेस ने ‘सेकुलरिस्म’ जैसे शब्द कि भी ‘गरिमा’ घटा दी.

कांग्रेस चाहती तो ‘जातिगत’ आरक्षण कों खत्म कर ‘आर्थिक’ आधार पर आरक्षण कों लागू कर सकती थी.
कांग्रेस चाहती तो धरा ३७० कों भी कबका खत्म कर सकती थी.
कांग्रेस भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाकर दोषियों कों सज़ा दिलवा सकती थी.
कांग्रेस चाहती तो अन्ना हजारे के आंदोलन के समय कई महत्वपूर्ण निर्णय लेकर देश में ‘परिवर्तन’ कि शुरुवात कर सकती थी.
कांग्रेस १६ दिसम्बर के दोषियों कों (नाबालिग आरोपी सहित) तत्काल फांसी दिलाकर देश में एक नया सन्देश दे सकती थी.
गुनाहगारों कों पनाह देना भी कांग्रेस राज कि एक बहोत बड़ी खासियत रही है . कांग्रेस के राज़ में हमेशा एक ‘लोला-पोला’ सरकार का आभास रहा है (खास कर पिछले दस वर्षों में )

एक ऐसी पार्टी जिसने ६५ साल तक ‘सत्ता’ का ‘ज़हर’ पीया हो, वह तो ‘नीलकंठ’ बन ही चुकी होगी, तो फिर उसे तो हर बदलती परिस्थिति के अनुसार रूप बदलकर खुले दिल से, इस देश के ‘राज-पटल’ पर ‘तांडव’ करना चाहिए था !

लेकिन सत्ता में बने रहने कि चाह और ‘गठबंधन’ कि ‘मजबूरियों’ ने उसे ऐसा करने नहीं दिया.
अन्ना हजारे का अनशन, १६ दिसम्बर कि दिल्ली बलात्कार कि घटना के बाद का जनाक्रोश, नित नए घोटाले और भ्रष्टाचार के मामले, सीमा पर कुर्बान होते सिपाही, पडोसी देश कि हिमाकत, चीन का देश कि सीमा के अंदर घुस जाना, नक्सली हमले, महंगाई, और बिगड़ती ‘कानून’ व्यवस्था के भी अनगिनत मौके – जिन मौकों पर सरकार आगे बढ़कर अगुवाई कर सकती थी, ये १२५ साल पुरानी पार्टी कि सरकार ‘मौन’ धारण कर बैठी रही. और ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि लग रहा था जैसे इस देश में सरकार नाम कि कोई चीज़ बची ही न हो.
यहाँ ज़रूरत थी एक नयी सोच की. घिसे-पिटे तरीकों से हट कर नए तौर-तरीके आजमाने की.

और सबसे बड़ा काम कांग्रेस कर सकती थी वो ये कि देश कि जनता कों एक सूत्र में बांधने का, एक जज्बा पैदा करने का. विकास का सपना दिखाने का, नौजवानों कों एक नयी राह पर चलने और कुछ करने का आह्वान कर उनमे जोश पैदा करने का. राष्ट्र कि आत्मा में एक नयी चेतना फूंकने का.
वह लोगों में इस देश के प्रति अपने ‘अधिकारों’और अपने ‘स्वामित्व’ कि भावना को जगा सकती थी. साथ ही ‘राष्ट्र’ के प्रति अपने ‘कर्तव्यों’ का आभास भी करा सकती थी.
लेकिन ‘कुछ कर गुजरने कि इच्छाशक्ति’ कांग्रेस में रही ही नहीं.
यह १२५ साल पुरानी पार्टी अपने ही अहंकार में डूब कर रह गयी. और जनता कों अपने पैरों कि ‘जूती’ समझकर जनता से नाता तोड़ लिया, जनता से जैसे इसे कोई सरोकार रहा ही नहीं.
यह बात शत प्रतिशत सही है कि अपने अहंकार में डूबी कांग्रेस पार्टी एक ‘वैचारिक दिवालिएपन’ के कगार पर पहुँच चुकी है. और उसे इस स्थिति में पहुंचाने के लिए वास्तविकता कों दरकिनार कर लोगों कों गुमराह करने कि कोशिश करनेवाले, गलत-बयानी करनेवाले और चाटुकारिता कि पराकाष्ठा करनेवाले उसके नेता ही जिम्मेवार है.

पिछले कुछ वर्षों में हमारी ‘संस्कृति’ का जो पतन हुआ, ‘निति-मूल्यों’ का र्हास हुआ, ‘नैतिकता’ ताक पर रखी गयी(याद कीजिये ‘संसद’ में क्या क्या हुआ), यही १२५ साल पुरानी पार्टी ‘मौन’ धारण कर अपने ‘ऐशो-आराम’ में मशगुल रही.इसके नेता, आदतन अपने स्वार्थ-पूर्ति में लगे रहे.

जबकि कांग्रेस चाहती तो युवाओं के ‘चरित्र निर्माण’ के साथ ही ‘राष्ट्र के नव-निर्माण’ का बीड़ा उठा सकती थी. (ऐसा करने कि कोशिश किसी ने की ?, मेरे अगले लेख में ज़रूर पढ़िए)

जो राजनितिक शून्यता पिछले कुछ वर्षों में निर्माण हुयी उसे दूर करने के लिए एक ऐसे नेता कि ज़रूरत थी जो ‘लीडर’ तो हो ही, और ‘फकीर’ भी हो, जिसका अपना जीवन ही ‘फकीरी’ में बीता हो जो खुद सत्ता में हो पर जिसके करीबी उसका नाजायज़ तो छोड़ ही दो जायज़ फायदा भी नहीं उठाना चाहते हो

अच्छा ये भी सोचा जाए के कांग्रेस कुछ फैसले लिक से हट कर कर लेती तो नुकसान क्या होता?
ज्यादा से ज्यादा कुछ साल सत्ता से दूर हो जाते?
फिर कांग्रेस पार्टी के पास खोने के लिए भी कुछ नहीं था.
पार्टी कि संपत्ति (पार्टी फंड) अपनी प्रमुख विपक्षी पार्टी से तीन गुना ज्यादा है.
सालों से उसके प्रतिनिधि सत्ता का सुख भोग चुके है. तो कुछ वर्ष अगर जनता के बीच में गुजारते तो क्या फर्क पड़ता? इसी बहाने समाज-सेवा कर लेते! लेकिन उनमे कुछ नया करने कि ‘इच्छाशक्ति’ मर चुकी थी.
किसी हाल में वे सत्ता से दूर नहीं रहना चाहते.
‘एक्सिट-पोल’ के अनुमान आने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्षा मैडम सोनिया गाँधी का ये बयान कि ‘हम क्षेत्रीय दलों के संपर्क में है’ का क्या मतलब निकाला जाए?
वही ‘जोड़-तोड़’ फिर से?
या ‘खरीद-फरोक्त’?
क्या आप, अगर सीटें कम मिलती हो तो, एक सशक्त विपक्ष का रोल नहीं अदा कर सकते?
जिन क्षेत्रीय दलों ने ‘राजनीति’ में आ कर देश को इस ‘रसातल’ में पहुँचाया आप फिर उन्ही से संपर्क में हैं, इसका क्या मतलब?

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From ‘Wishes’ to ‘Reality’ …

Not getting ‘words’ but
A lot to ‘speak’

Not getting ‘hurt’ still
A lot to ‘heal’

Have fear of being left ‘lonely’
But want to be ‘alone’

‘Known’ by many but
Wish to be ‘unknown’

‘Moving’ ahead every moment
But just wish to ‘stay’ forever

Wish to ‘cry’ but ‘smiling’ like
Nothing happened to me ever

Want to be ‘strong’ but
Deep ‘broken’ inside,

Want to ‘show’ feelings but
Can do nothing except to ‘hide’

Wish to be ‘real’ but
Still acting ‘fake’

Wish to ‘continue’ but
Still need a ‘break’….

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बादल

दूर आसमान में बादल
मुझको मतवाला बनाता बादल
कभी दिलवाला, कभी अलबेला बादल,
‘मन मोर’ को नचाता,
कभी मदहोश कर देता बादल,

कभी अटखेलियाँ करता बादल,
कभी अकेले ही घटाओंसे लड़ता बादल,
झरोखें से मुझको देखता बादल,
कभी मेरा पीछा करता बादल,
मेरे साथ दौड़ता – खेतों खेतों लहराता बादल,
कभी साथ मेरे चलता बादल,

कितने सारे सपनों का बादल,
किसी के सोलह सिंगार का बादल,
मेरे पहले प्यार का बादल,
यादों में ले जाता बादल,

बचपन सा नन्हासा बादल,
उमड़ घुमड़ करता बादल,
आशाएं जगाता
नित नया बादल,
जीवन का विश्वास बादल,
राह नयी दिखलाता बादल,
मोक्ष हमको दिलाता बादल,
नयी सृजन का कारण बादल

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क्रांति तीर्थ

झांको कभी उनके जीवन में भी ज़रा
झोंक दिया जिन्होंने जीवन को अपने,
और अर्पण कर दिया अपना सब कुछ,
मातृभूमि के चरणों में

कितने अनाम हुए शहीद
कितनों के नाम भी हम भूल गए,
हमें आज़ाद देखने की धुन में,
वो दीवाने गुमनाम हो गए,

शरीर कों त्याग तो दिया
गुलामी के साये में
और अंतिम क्षणों में नहीं थी
गोद मातृभूमि की,
कसक रह गयी मन में
माँ कों आज़ाद देखने की

आत्मा उनकी लेकिन गाती रही,
स्वरलहरी स्वंतंत्रता की
जड़ें हिला दी पूरब ने
पश्चिम के साम्राज्य कि

शरीर नहीं तो क्या हुआ
उन वीरों कि ‘अस्थियां’ ही सही
आज माता कि गोद में हैं
‘अस्थि-कलश’ में समाया
वो सर्वोच्च ‘बलिदान’,
वो ‘त्याग’,
वो ‘इन्कलाब’
माता के चरणों में अर्पित हैं

( भेंट १९.०२.२०१२)

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