१२५ साल पुरानी पार्टी

(A party that would have been ‘different’)

अप्रैल ७ से लेकर मई १२ तक चले मतदान के पूरा होते ही सबको चुनावों के नतीजों का इंतज़ार है.
१६ मई कों चुनावों के नतीजों के आने के साथ ही देश में नयी सरकार के गठन कि प्रक्रिया शुरू हो जायेगी.
आम आदमी (मतलब हम सब = जनता) यही उम्मीद करता है कि जो पार्टी जीतें वो पूर्ण बहुमत से जीते और जो सरकार बने या जिसकी भी सरकार बने वो एक स्थायी सरकार हो और पांच साल वह सरकार जनता कि भलाई के लिए और जनता के कल्याण के लिए काम करे.
देश कों एक नयी प्रेरणा दे. देश कों एक नयी दिशा दे. देश कों एकात्म करें !!
देश में विकास का और भाईचारे का, चैन और अमन का वातावरण निर्माण करे.
देश में चली आ रही सड़ी गली राजनीति से ऊपर उठकर जनहित में कार्य करें और कानून का राज्य स्थापित करने में मदद करें.

२०१४ के चुनावोंके लिए मतदान शुरू होने से पहले तक सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी अपना ‘१२५ साल पुरानी पार्टी’ होने का राग अलापती रही. और सबसे पुरानी पार्टी होने कि दुहाई देती रही. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान इस बात कों उन्होंने ज्यादा तव्वजो नहीं दी या इस मुद्दे कों ज्यादा उछाला नहीं. पता नहीं क्यों?
लेकिन जब जब कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता राशिद अल्वी साहब चुनाव से पहले हर बार, अपनी खास लच्छेदार भाषा में इस बात का उल्लेख करते रहते तो मुझे बहुत पीड़ा होती थी और अब भी होती है, क्यों कि कांग्रेस १२५ साल पुरानी पार्टी होने के बावजूद भी जनता कि नब्ज़ नहीं पकड़ पायी. शासन कों प्रभावशाली बनाए रखने के लिए नए नए तरीके नहीं ढूँढ पायी.
देश में एक नव-चेतना का वातावरण निर्माण नहीं कर पायी. बल्कि लोग दिन ब दिन उदासीनता कि खायी में धंसते चले गए और ‘सरकार’ से – शासन प्रणाली से- यहाँ तक कि लोकतंत्र कि सभी ‘संस्थाओं से – उनका ‘मोह-भंग’ होता गया.

एक ऐसी पार्टी जो अपने आप कों बार बार ‘१२५ साल पुरानी पार्टी’ बता रही हो और जो करीब ६० साल तक देश में सत्ता के केंद्र में रही हो वो चाहती तो बहुत कुछ कर सकती थी.
उनके पास लीक से हटकर काम करने का पूरा मौका था. जरुरत थी तो सत्ता कि लालसा कों त्यागकर, तुष्टिकरण और जात पात कि राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में कार्य करने की. कांग्रेस ने हमेशा अपने आप कों सबसे ज्यादा ‘सेकुलर’ बताने कि कोशिश कि, और असल में कांग्रेस ने ही हमेशा कभी धर्म के नाम पर, कभी जाती के नाम पर, कभी आरक्षण के नाम पर लोगों कों बांटने कि राजनीति की.
कांग्रेस ने ‘सेकुलरिस्म’ जैसे शब्द कि भी ‘गरिमा’ घटा दी.

कांग्रेस चाहती तो ‘जातिगत’ आरक्षण कों खत्म कर ‘आर्थिक’ आधार पर आरक्षण कों लागू कर सकती थी.
कांग्रेस चाहती तो धरा ३७० कों भी कबका खत्म कर सकती थी.
कांग्रेस भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाकर दोषियों कों सज़ा दिलवा सकती थी.
कांग्रेस चाहती तो अन्ना हजारे के आंदोलन के समय कई महत्वपूर्ण निर्णय लेकर देश में ‘परिवर्तन’ कि शुरुवात कर सकती थी.
कांग्रेस १६ दिसम्बर के दोषियों कों (नाबालिग आरोपी सहित) तत्काल फांसी दिलाकर देश में एक नया सन्देश दे सकती थी.
गुनाहगारों कों पनाह देना भी कांग्रेस राज कि एक बहोत बड़ी खासियत रही है . कांग्रेस के राज़ में हमेशा एक ‘लोला-पोला’ सरकार का आभास रहा है (खास कर पिछले दस वर्षों में )

एक ऐसी पार्टी जिसने ६५ साल तक ‘सत्ता’ का ‘ज़हर’ पीया हो, वह तो ‘नीलकंठ’ बन ही चुकी होगी, तो फिर उसे तो हर बदलती परिस्थिति के अनुसार रूप बदलकर खुले दिल से, इस देश के ‘राज-पटल’ पर ‘तांडव’ करना चाहिए था !

लेकिन सत्ता में बने रहने कि चाह और ‘गठबंधन’ कि ‘मजबूरियों’ ने उसे ऐसा करने नहीं दिया.
अन्ना हजारे का अनशन, १६ दिसम्बर कि दिल्ली बलात्कार कि घटना के बाद का जनाक्रोश, नित नए घोटाले और भ्रष्टाचार के मामले, सीमा पर कुर्बान होते सिपाही, पडोसी देश कि हिमाकत, चीन का देश कि सीमा के अंदर घुस जाना, नक्सली हमले, महंगाई, और बिगड़ती ‘कानून’ व्यवस्था के भी अनगिनत मौके – जिन मौकों पर सरकार आगे बढ़कर अगुवाई कर सकती थी, ये १२५ साल पुरानी पार्टी कि सरकार ‘मौन’ धारण कर बैठी रही. और ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि लग रहा था जैसे इस देश में सरकार नाम कि कोई चीज़ बची ही न हो.
यहाँ ज़रूरत थी एक नयी सोच की. घिसे-पिटे तरीकों से हट कर नए तौर-तरीके आजमाने की.

और सबसे बड़ा काम कांग्रेस कर सकती थी वो ये कि देश कि जनता कों एक सूत्र में बांधने का, एक जज्बा पैदा करने का. विकास का सपना दिखाने का, नौजवानों कों एक नयी राह पर चलने और कुछ करने का आह्वान कर उनमे जोश पैदा करने का. राष्ट्र कि आत्मा में एक नयी चेतना फूंकने का.
वह लोगों में इस देश के प्रति अपने ‘अधिकारों’और अपने ‘स्वामित्व’ कि भावना को जगा सकती थी. साथ ही ‘राष्ट्र’ के प्रति अपने ‘कर्तव्यों’ का आभास भी करा सकती थी.
लेकिन ‘कुछ कर गुजरने कि इच्छाशक्ति’ कांग्रेस में रही ही नहीं.
यह १२५ साल पुरानी पार्टी अपने ही अहंकार में डूब कर रह गयी. और जनता कों अपने पैरों कि ‘जूती’ समझकर जनता से नाता तोड़ लिया, जनता से जैसे इसे कोई सरोकार रहा ही नहीं.
यह बात शत प्रतिशत सही है कि अपने अहंकार में डूबी कांग्रेस पार्टी एक ‘वैचारिक दिवालिएपन’ के कगार पर पहुँच चुकी है. और उसे इस स्थिति में पहुंचाने के लिए वास्तविकता कों दरकिनार कर लोगों कों गुमराह करने कि कोशिश करनेवाले, गलत-बयानी करनेवाले और चाटुकारिता कि पराकाष्ठा करनेवाले उसके नेता ही जिम्मेवार है.

पिछले कुछ वर्षों में हमारी ‘संस्कृति’ का जो पतन हुआ, ‘निति-मूल्यों’ का र्हास हुआ, ‘नैतिकता’ ताक पर रखी गयी(याद कीजिये ‘संसद’ में क्या क्या हुआ), यही १२५ साल पुरानी पार्टी ‘मौन’ धारण कर अपने ‘ऐशो-आराम’ में मशगुल रही.इसके नेता, आदतन अपने स्वार्थ-पूर्ति में लगे रहे.

जबकि कांग्रेस चाहती तो युवाओं के ‘चरित्र निर्माण’ के साथ ही ‘राष्ट्र के नव-निर्माण’ का बीड़ा उठा सकती थी. (ऐसा करने कि कोशिश किसी ने की ?, मेरे अगले लेख में ज़रूर पढ़िए)

जो राजनितिक शून्यता पिछले कुछ वर्षों में निर्माण हुयी उसे दूर करने के लिए एक ऐसे नेता कि ज़रूरत थी जो ‘लीडर’ तो हो ही, और ‘फकीर’ भी हो, जिसका अपना जीवन ही ‘फकीरी’ में बीता हो जो खुद सत्ता में हो पर जिसके करीबी उसका नाजायज़ तो छोड़ ही दो जायज़ फायदा भी नहीं उठाना चाहते हो

अच्छा ये भी सोचा जाए के कांग्रेस कुछ फैसले लिक से हट कर कर लेती तो नुकसान क्या होता?
ज्यादा से ज्यादा कुछ साल सत्ता से दूर हो जाते?
फिर कांग्रेस पार्टी के पास खोने के लिए भी कुछ नहीं था.
पार्टी कि संपत्ति (पार्टी फंड) अपनी प्रमुख विपक्षी पार्टी से तीन गुना ज्यादा है.
सालों से उसके प्रतिनिधि सत्ता का सुख भोग चुके है. तो कुछ वर्ष अगर जनता के बीच में गुजारते तो क्या फर्क पड़ता? इसी बहाने समाज-सेवा कर लेते! लेकिन उनमे कुछ नया करने कि ‘इच्छाशक्ति’ मर चुकी थी.
किसी हाल में वे सत्ता से दूर नहीं रहना चाहते.
‘एक्सिट-पोल’ के अनुमान आने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्षा मैडम सोनिया गाँधी का ये बयान कि ‘हम क्षेत्रीय दलों के संपर्क में है’ का क्या मतलब निकाला जाए?
वही ‘जोड़-तोड़’ फिर से?
या ‘खरीद-फरोक्त’?
क्या आप, अगर सीटें कम मिलती हो तो, एक सशक्त विपक्ष का रोल नहीं अदा कर सकते?
जिन क्षेत्रीय दलों ने ‘राजनीति’ में आ कर देश को इस ‘रसातल’ में पहुँचाया आप फिर उन्ही से संपर्क में हैं, इसका क्या मतलब?

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