क्रांति तीर्थ

झांको कभी उनके जीवन में भी ज़रा
झोंक दिया जिन्होंने जीवन को अपने,
और अर्पण कर दिया अपना सब कुछ,
मातृभूमि के चरणों में

कितने अनाम हुए शहीद
कितनों के नाम भी हम भूल गए,
हमें आज़ाद देखने की धुन में,
वो दीवाने गुमनाम हो गए,

शरीर कों त्याग तो दिया
गुलामी के साये में
और अंतिम क्षणों में नहीं थी
गोद मातृभूमि की,
कसक रह गयी मन में
माँ कों आज़ाद देखने की

आत्मा उनकी लेकिन गाती रही,
स्वरलहरी स्वंतंत्रता की
जड़ें हिला दी पूरब ने
पश्चिम के साम्राज्य कि

शरीर नहीं तो क्या हुआ
उन वीरों कि ‘अस्थियां’ ही सही
आज माता कि गोद में हैं
‘अस्थि-कलश’ में समाया
वो सर्वोच्च ‘बलिदान’,
वो ‘त्याग’,
वो ‘इन्कलाब’
माता के चरणों में अर्पित हैं

( भेंट १९.०२.२०१२)

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