रूद्र तांडव

हर गली नुक्कड़ पे
हर रस्ते चौराहे पे
‘वहशी- दरिंदे’
पल पल उभरते हैं जैसे
भयानक चेहरे,
हों अनगिनत शीश इनके,
वही सूरत हर जगह हैं
मैं किस किस से लडूं !

लाख चाहूँ
पर रोक ना पाऊँ
खौलती हैं मन में
एक रक्तपिपासा,
आभास हर पल होता है
के बीच चौराहे पर मैं
करता हूँ सर धड से अलग
उस नराधम का, और
कर रक्त प्राशन उसका
‘नरसिंह’ मैं
उसकी ‘अंतड़ी’ उधेड़ कर,
कर रहा हूँ  ‘तांडव’,
के सबक मिले ,
के सबक मिले हर दुराचारी को,
और समझ लें सभी के
‘वतन’ हैं मेरा ‘जिंदा’ अभी !

पर क्या किसी एक को मार कर
होगा उद्देश्य मेरा पूरा
मैं कौनसी गलती करूँ माफ
क्या बच्चियों पर ‘छींटाकशी’
करनेवाले को मैं छोड़ दूं,
पर क्यों न मैं पाप कि
जड़ ही अभी मिटा दूं,
या करूँ मैं इंतज़ार
कोई बड़ी वारदात हो फिर,
आये कोई बुलावा
क्या
तब तक मैं उबलने दूं ’लावा’ !

घूँट रहा हैं दम अब
इस ‘नपुंसकता’ के जंगल में
हर शाख पर जहां शैतान बसा है
हर दिशा आदम खोर खडा है
हर मोड इंसानियत के दुश्मन हैं
हर रोज एक नया वाकया हैं,
हर जुल्म एक नयी खबर हैं,
हर अबला जहां बेबस हैं,
हर बच्चा जहां ‘खिलौना’ हैं –
‘वहशी’ इंसान के हाथ का,
‘भारत-माँ’ तो बस किसी शब्द का नाम हैं
औरत तो नोचने कि चीज़ हैं,

‘देवियाँ’ पत्थर कि ‘मूर्ति’ हैं,
बालिकाएं लक्ष्मी का रूप हैं?
–    ये तो एक छलावा हैं !!

हमने बनाएँ कितने मंदिर –
ये तो एक दिखावा हैं !!

बेटी-माँ-बहिन –बीवी रिश्ते नहीं
सब ‘एक’ ‘जिस्म’ के नाम हैं,
हर तरफ मंडराते इनपर
गिद्ध लाखों – हज़ार हैं !!

मेरा पुरुषार्थ मुझे धिक्कारता है
लेकिन क्या एक को मारने से
मेरा कार्य समाप्त हो जाता हैं,
मुझे हाथ हज़ार दे दो भगवान
मार सकूं मैं हर रावण को
मुझे इतने राम दे दो राम
नाश हर ‘दैत्य’ का कर,
हमारी पीड़ा हर लो राम,
‘रूद्र-तांडव’ का समय अब,
अब तो जागो …..

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