Yeh Jo Desh Hai Tera ………

प्रजा से अभी भी कोसों दूर – ‘सत्ता’,‘तंत्र’ !

देश आज ६४ वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. इन ६४ सालों में निश्चित तौर पर हमने प्रगति की है. विकास हुआ हैं. लेकिन साथ ही साथ हमने ‘मूल्यों’ को खो भी दिया हैं. इनका जतन करने कि बात तो दूर, दिन ब दिन होते उनके पतन को रोकने तक कि कोशिश करना भी हमने छोड़ दिया. हमारी सभ्यता, हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति, हमारे आदर्श, हमारे विचार, हमारे उद्देश्य सब हमें चिढ़ा रहे हैं.
क्योंकि हमने चाहे विकास किया हो, चाहे हमने तकनीकीकरण और वैज्ञानिक क्षेत्र में नयी उपलब्धियां हासिल की हो, हमारी गिनती भी विश्व के चुनिन्दा विकासशील राष्ट्रों में होती हो – पर हम अभी भी बुनियादी विकास से बहोत दूर है. हमने ‘मतदाता’ भी निर्माण करने में ‘विकास’ किया है, पर ‘अच्छे नागरिकों’ का निर्माण और ‘चरित्र-निर्माण’ से एक अच्छे ‘राष्ट्र’ का निर्माण अभी बाकी हैं. नीति-मूल्यों के विकास कि बात करना भी अब जरुरी हो गया है.

उदारीकरण, बाजारीकरण और वैश्वीकरण में तो हम आगे बढते दिखाई देतें हों, पर ‘आम’ आदमी से, जनता के सरोकार से हम बहोत दूर होते जा रहे हैं. कुछ मुट्ठी भर लोग जिनके हाथ में सत्ता हैं, या जो जन-प्रतिनिधि हैं, उनके सगे सम्बन्धी, उनके चाटुकार मित्र, उनके चेले चपाटे और जिन्हें सत्ता ने अपने रुतबे से खरीद लिया हैं बस उन्ही लोगों का राज चल रहा है, और सत्ता और पैसे के बल पर ये चुनिन्दा लोग ही अपनी अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं.

एक तरफ हम चाँद पर, मंगल पर खोज करने कि बात करते है. एक तरफ विकास के बड़े बड़े वायदे करते है. वहीँ दूसरी तरफ अभी भी ‘पीने’ के पानी कि समस्या, ‘बिजली’ कि कमी, गरीबी, भुखमरी, आवास-निवास, और पक्की सड़कों का न होना जैसी समस्याएँ मौजूद हैं. पिडीतोंको सालों साल तक न्याय नही मिलता. इन समस्याओंके अलावा देश में हर रोज हो रहे अपराध हमें सोचने पर मजबूर करतें हैं कि आखिर जिस धरती पर ऐसे महान धर्म एक साथ पलें, जिन्होंने इंसान को, इंसानियत को सबके ऊपर तरजीह दी, आज उसी धरती पर बेलगाम जुल्म ज़ारी है, महिलाओं और बच्चों, बुजुर्गों के खिलाफ ‘इंसानियत’ को शर्मसार करनेवाले अपराध ज़ारी है. हमें अपने आप पर घिन्न आने लगे इस हद तक या उससे ज्यादा हम अपनी नज़रों में गिर गए हैं. फिर भी हम जिंदा हैं. फिर भी हम बर्दाश्त करतें हैं.
क्योंकि चाहे कुछ भी हो जाए, कुछ भी होता रहे हम ‘बर्दाश्त’ जरुर करतें है. हमारी ‘नपुंसकता’ को हमने अपनी ‘सहिष्णुता’ के नाम पर ढांक लिया हैं. इसीलिए कुल मिलाकर एक ‘अनुशासनहिन्’ समाज, एक ‘लचर-पचर’ कानून व्यवस्था और एक ‘लोला पोला’ सरकार हमारे प्रतिक रूप बन गए हैं.
दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश होगा जहाँ पर एक ‘शरीफ’, कायदा-कानून माननेवाले, उनका पालन करनेवाले, सच्चाई कि राह पर चलने वाले और ईमानदार लोगों के लिए , ऐसे नागरिकों के लिए, जीना उतना ही कठिन, और मुश्किलों भरा हैं जितना आसान वह गुंडे, बदमाश, दबंग, भ्रष्टाचारी, अपराधियों और आतंकवादियों के लिए है. अपराधी यहाँ छाती ठोक के अपराध करते हैं और आज़ाद घूमते हैं , निरपराध मारे जाते है, निर्दोष कि बलि दी जाती हैं. हर नये अपराध के साथ अपराधियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं क्योंकि ‘नपुंसक’ ‘व्यवस्था’ उसकी शरण में चली जाती है और कानून के ढीले ढाले पेंच उसके बचने कि राहें आसान करती हैं.
भारत ही ऐसा देश होगा , जिसका पडोसी मुल्क छाती ठोक के उसके सैनिकों के सर कलम करता हैं और साथ ले जाता हैं, फिर सद्भावना के नाम पर ‘लज़ीज़’ पकवानों का ‘मजा’ लेने उसीके घर चला आता हैं. और हमें अपने सैनिकों कि जान से ज्यादा दुश्मन से ‘क्रिकेट’ खेलने में ज्यादा रस आता है, और ‘संबंधों को लचीला’ करने कि पहल के नाम पर खेल में ‘हार’ कि रूपरेखा को भी हम पहले से तैयार कर लेतें हैं.
भारत ही ऐसा देश होगा जहां ‘शहीदों’ को उचित समान नही मिलता , यहाँ तक कि उनके परिवार वालों को आवंटित ‘पेट्रोल-पम्प’ तक दबंग कब्ज़ा कर लेतें हैं या उनमे भ्रष्टाचारी अपना हाथ साफ़ कर लेतें हैं.
देश में हालात इतने खराब हैं कि जिसकी जहां मर्ज़ी होती है वो वहीँ ‘बलात्कार’ कर देता है. इसको आप ‘बलात्कार’ के शब्दार्थ के रूप में लेंगे तो जल्द समझ पायेंगे.
गुंडई, दबंगई, हैवानियत इस कदर बढ़ गयी है कि अब संसद जैसी ‘पवित्र’ जगह पर भी लोग ‘बल’ का प्रयोग करतें हैं, जैसा कि पिछले दिनों समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने ‘आरक्षण’ बिल फाड़ने में किया. अब तो सत्ता में बैठें कुछ लोगों ने ‘आम’ जनता के साथ मानसिक ‘बलात्कार’ करना शुरू कर दिया है.
जैसा कि ‘अन्ना-आंदोलन’ और ‘दामिनी’ बलात्कार केस के सिलसिले में आये विवादास्पद बयानों से जाहिर होता है.
एक बहोत ही संगीन मामले को ‘ढुलमुल’ रवैयेसे कमज़ोर बनाकर ‘इंसानी’ ज़ज्बातों का गला घोटने कि सोची समझी साजिश के तहत ही ये सब होता है. ताकि थक हार कर जनता ‘सत्ता’ के सामने शरणागत बन जाए, उसके सामने झुक जाए और दोबारा फिर ऐसी घटना घटे तो भी वो ‘आयी-गयी’ बात बन के रह जाए.
‘शुभ संकेत’ के रूप में तस्सली देनेवाली बात इतनी हैं कि पिछले दो वर्षों में जो जनाक्रोश दिखाई दिया, जो जागरूकता लोगों में आयी हैं वो आनेवाले समय में भी बरक़रार रहे तो अच्छा वरना हमारी आनेवाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी, और हम जो गर्व महसूस करते थे कि ‘मैंने इस देश में जनम लिया’ उस बात पर कहीं हमें शर्मिंदा ना होना पड़े. इसके लिए अभी भी एक बड़े आंदोलन कि जरुरत हैं, जो ‘ज्वालामुखी’ बन कर मौजूदा व्यवस्था पर फूट पड़े, और हमारे ‘महामहिम’ ने जो कहा हैं कि ‘पिछले ६० वर्षों’ में जो बदलाव नहीं आया वो अगले ‘दस सालों’ में होगा उसे सही साबित करें !
हमें और हमारे वतन को अपने अंदर फिर से झाँकने कि जरुरत हैं …
अंत में फिर साहिर कि इन पंक्तियों के साथ आज कि बात यहीं खत्म करता हूँ …

“अपने अंदर ज़रा झाँक मेरे वतन, अपने ऐबों को मत ढांक मेरे वतन’ … (संपूर्ण गीत के इये इस कड़ी पर अवश्य जाएँ ..

http://atulsongaday.me/2012/01/22/apne-andar-zaraa-jhaank-mere-watan/

 

 

 

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