Yeh Jo Desh hai tera…….

(… जिन्हें नाज़ हैं ‘संसद’ पर वो कहाँ है,)
हमने देखा कि अन्ना के आंदोलन के दौरान पिछले कुछ दिनों में अचानक ‘संसद’ के प्रति कुछ लोगों का प्यार उमड़ आया . संसद कि गरिमा , संसदीय व्यवस्था ,इत्यादि के प्रति कुछ लोग जागरूक हो गए हैं. इनमें कुछ उच्च पदस्थ लोग जैसे की पूर्व न्यायाधीश भी शामील हैं.
यहाँ मैं एक चीज़ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि संसद के प्रति हर भारतीय कि निष्ठा और खासकर  सामान्य जनता कि निष्ठा, विश्वास, एवं ‘भारतीय संसद’ का अभिमान किसी भी नेता या ‘मौकापरस्त’ और ‘स्वार्थी’ लोगों से से ज्यादा ही है.
हमारी संसदीय व्यवस्था पर हमें नाज़ हैं, हमारे देश के ‘संविधान’ जैसा ‘संविधान’ शायद ही दुनिया में किसी देश का हो. हमारे ‘संघीय’ ढांचे पर भी हमें गर्व है.
और इसीलिए जब कभी भी हमारी ‘संसद’, ‘संसदीय’ व्यवस्था या फिर हमारे ‘संघीय ढांचे’ का अपमान होता हो या इसकी गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले कार्य होते हो तो हमें इसका कड़े से कड़े शब्दों में विरोध तो करना ही चाहिए एवं इसकी रक्षा के लिए भी आगे आना चाहिए.
तो इन अचानक जागृत हुए सभी महानुभावोंसे मैं पूछना चाहतां हूँ कि ‘संसद’ के ऊपर हमले के आरोपी अभी भी सजा से वंचित क्यों है. जो लोग संसद पर हुए हमले में शहीद हुए थे उनके घरवालों कि क्या आपने कभी सुध ली? शहीदों के रिश्तेदारों को आवंटित किये गए पेट्रोल पम्प तक में घोटाले हुए या उनसे हड़पने कि कोशिशे हुई, उस समय आपने कुछ किया?
या तो फिर जब संसद में हमारे सम्मानीय सांसद बार बार गैर हाजिर होते है, महत्वपूर्ण मुद्दों कि चर्चा के समय सोतें हैं, बिना कारण ‘वाक आउट’ करतें है, जनता कि गाढ़ी कमाई का करोड़ों रूपया पानी कि तरह जब बहाया जाता हैं, तब आप क्या करते हैं? तब संसद कि ‘गरिमा’, इसकी ‘पवित्रता’ का आपको स्मरण नहीं होता है क्या जनाब?
देश में कई लोगों को एक समय का भर पेट भोजन तक नहीं मिलता हैं और हमारे सांसद ‘रिआयती’ दरों पर संसद कि कैंटीन में ‘लज़ीज़’ खाना उड़ाते हैं. तब आप विरोध प्रकट क्यों नहीं करते?
वैसे तो किसी भी ‘राष्ट्रहित’ या ‘सामान्य जनता’ के हितों के मुद्दों पर हमारे सांसदों में ‘एकता’ नहीं होती पर खुद के भत्तों कि बढ़ोतरी के समय सब सांसद इस पर मुहर लगाने के लिए अभूतपूर्व (!) ‘एकता’ का प्रदर्शन करते हैं, कैसे?
जब सांसद ‘संसद’ में ‘अभद्र’ भाषा का प्रयोग करते हैं, ‘रुपयें’ उछालते है, ‘धींगा-मुश्ती’ करते हैं, और देश का ‘बेशकीमती’ समय बर्बाद करतें हैं, तब ‘संसद’ और ‘संसदीय व्यवस्था’ कि ‘गरिमा’ का आपको विचार आता है?
क्या तब आपको ‘संसद’ के ‘सम्मान’, इसके ‘अस्तित्व’ कि याद आती है, इसके ‘पावित्र्य’ का ख्याल आता है?
कई साल पहले साहिर कि लिखी हुई पंक्तियाँ मुझे याद आती है .. ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है?’
इसी तर्ज़ पर संसद के मान –सम्मान से जुडी कुछ बातें मेरे जेहन में आयी..कविता के रूप में;

.. हैं सजा से दूर संसद के हमलावर अभी भी, हैं बर्दाश्त हमको मुंबई के कातिल भी देखो, और शहीदों के परिवार की मुश्किलों को तो समझो,जिन्हें नाज़ हैं संसद पर वो कहाँ हैं.. कहाँ है..कहाँ है?

ज़रा इन सांसदों के बंगले तो देखो, इनकी ऐशो-आरामी के साधन भी देखो, और हमारे बेबस किसानों की लाचारी को समझो, जरा इनकी हालत पर कुछ तरस तो खाओ … जिन्हें नाज़ हैं संसद पर वो कहाँ है?,

जब संसद में उछले थे नोटों के बन्डल, लगी ठेस दिल को हुए हम थे घायल, यह मुद्दों पे शोरगुल -सदस्यों का दंगल, जिन्हें नाज़ हैं संसद पर वो कहाँ है, कहाँ है,

… जरा संसद के रहबरों को बुलाओ, यह नए-नए घोटालों कि फेहरिस्त दिखाओ, कैसे-कैसे लूटें वोह पब्लिक के पैसे बताओ, जिन्हें नाज़ है संसद पर उनको लाओ, … कहाँ है, … कहाँ है, … कहाँ है!

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2 Responses to Yeh Jo Desh hai tera…….

  1. Thank you very much for your valuable feedback!

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