Yeh Jo Desh hai tera…….

(‘दिल्ली का ठग ‘ और ‘भारत निर्माण’)
देश एक निर्णायक मोड पर है, कौन ठग है और कौन नहीं यह पहचानना जरुरी है. वैसे हमारे देश में ठगी कोई नई बात नही है. जगह जगह आपको ठग मिल जायेंगे जो भोले भाले और मासूम, सज्जन लोगों को लुटते फिरते है, सार्वजनिक जगहों जैसे बस-स्थानक,रेलवे स्टेशन, मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर इनकी रेल चेल रहती ही है. कौन किसको कब और कहाँ ठगेगा यह बताना मुश्किल है. स्वाभाविक है की ‘दिल्ली’ देश की राजधानी होने की वजह से ठग और बदमाशोने अपना ठिकाना वहाँ भी बना लिया है. देश के विभिन्न प्रान्तों से लोग दिल्ली में बसे हुए है, और राजनीति में भी हैं. राजनीति के साथ साथ जनता से ठगी करनेवाले भी हैं. अब असली ठग को पहचानना हमारे लिए सबसे बड़ा कार्य है.गंभीर मुद्दों को ठगी का नाम देकर उनका गाम्भीर्य कम कर देना  या ओछे आरोप-प्रत्यारोप लगाकर राजनीति करना भी जनता के साथ ठगी ही है. और भला यह क्या बात हुई के राजनीति केवल कुछ गिने चुने लोग ही करे और बाक़ी हाथ पर हाथ रख तमाशा देखे ?
हमारे देश में जहां सब कुछ राजनीति से ही जुड़ा हुआ हैं तो फिर हर नागरिक का कर्तव्य बन जाता है की वह भी राजनीती को समझे , उसमे हिस्सा ले और वक्त आने पर नाकारा व्यवस्था को बदल डाले.
पिछले दो सप्ताह में हमारे देश में जो भी घटनाक्रम हुआ है, उसमे बार बार सत्तर के दशक को याद किया गया और तब और अब कि परिस्थितियों कि तुलना भी हुई. वोह दौर मेरे बचपन का दौर था और उससे जुडी बहोत सी यादें हैं जो इस दौरान उभरकर आई. कैसे जीवनावश्यक वस्तुओंके भाव कई गुना बढ़ने लगे थे और फिर बढते ही चले गए इसका भी स्मरण हुआ.
सबसे पहले तो इस लेख को पढते समय जरा उस गीत को याद करते रहिये जो आजकल ‘टी व्ही’ पर जोर शोर से दिन भर बजते रहता है …..“ हो रहा भारत निर्माण’ ! अब सब घटनाक्रम और देश में हर रोज नयी ऊंचाईयां को छूते हुए गुनाहों और मासूमों पर हो रहे अत्याचारों को याद कीजिये और इस गीत को याद कर किस तरह का ‘भारत-निर्माण’ हो रहा है, जरा उसे समझने की कोशिश कीजिये.
अब बात करते हैं सत्तर के दशक की. तब देश में महंगाई का दौर शुरू हुआ, भ्रष्टाचार के खिलाफ भी आवाज़ उठना शुरू हुई, ‘नव-निर्माण’ आंदोलन चला और ‘आपात काल’ भी थोंपा गया.
हिंदी फिल्मों के गीतों के माध्यम से देखते है कि देश के हालात और परिस्थितियों में क्या कोई बदलाव आया है, विकास तो हुआ है,लेकिन निति-मूल्यों का घोर पतन हुआ है और बुनियादी सुविधओंका अभी भी अभाव है,
उस दौरान कई ऐसी फिल्में आयी जिसमे मौजूदा समाजीक मुद्दों को भी छुआ गया, ऐसी फिल्मों में ‘सत्यकाम’,’मेरे अपने’,रोटी-कपड़ा-और मकान’,’रोटी’,’नमक-हराम’ और ‘बे-ईमान’ इत्यादि शामिल है, इन फिल्मों के कुछ गीतों के माध्यम से देखिये की ‘भारत-निर्माण’ का ‘रीमिक्स’ कैसे बनता है;
आबो हवा देश कि बहोत साफ़ है-कायदा है-कानून है, इन्साफ है,
अल्लाह मियां जाने कोई जिए या मरे – आदमी को खून वून सब माफ़ है,
और क्या कहूँ – छोटी मोटी चोरी,रिश्वत खोरी – देती है अपना गुज़ारा यहाँ..
शक्कर में यह आटे की मिलाई मार गयी –पौडर वाले दूध की मलाई मार गयी,
राशन वाले लाइन की लम्बाई मार गयी-जनता जो चीखी चिल्लाई मार गयी,
किसी को तो रोटी की कमाई मार गयी,कपडे की किसी को सलाई मार गयी,
किसी को मकान की बनवाई मार गयी, और, बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी,
ना इज्ज़त की चिंता ,ना फिकर कोई अपमान की, जय बोलो बेईमान कि,
जय बोलो बेईमान कि ,जय बोलो!
बेईमानी से ही बनते हैं बंगले बाग बगीचे – सर से ऊपर पंखे चलते पाँव तले गलीचे,
रीत-रिवाज धर्म और मजहब दब जाते हैं नीचे-बेईमान सबसे आगे और दुनिया पीछे-पीछे,
मेहनत से बने न कुटीया –अरे छोडो बात मकान की, जय बोलो बेईमान की…

लेकिन जब बार बार ‘ठगी’ की बात चली तो एक गीत बरबस मुझे याद आया – फिल्म है ‘मदर-इंडिया’ ……….हमरी सारी मेहनत माया ठगवा ठग ले जाए’ -जिस तरह इस फिल्म की नायिका एक साहूकार के चंगुल में जकड़ी जाती है उसी तरह ‘काला धन’ और ‘जमाखोरी’ से त्रस्त ‘भारत-माता’ आज भी ‘भ्रष्टाचारियो’, ‘ढोंगी राजनेताओं’ और ‘काला बाजारियों’ के ‘शोषण’ से त्रस्त है.
अब सवाल यह के १२० करोड जनता को कब तक ‘ठगा’ जा सकता है?, हो सकता है कई लोग आज नहीं समझ पा रहे हो, पर धीरे धीरे जनता जागृत हो रही है…….
ए बाबु , यह पब्लिक है पब्लिक,
यह जो पब्लिक है यह सब जानती है पब्लिक हैं, अंदर क्या हैं-बाहर क्या हैं, यह सब कुछ पहचानती हैं…….यह जनता ही करेगी एक अच्छे और सच्चे ‘भारत’ का ‘नव-निर्माण’
और जो गिने चुने अच्छे लोग अभी भी इस देश मे बचे हुए है, वह भी थक-हार कर खराब ना हो जाये इसलिये लडाई को जारि रखना जरुरी है ! (दलीय राजनीति से परे यह बात कहनेवाले एक ही है गुजरात के मुख्यमंत्री श्री.नरेन्द्रभाई मोदी,जो स्वगाताहार्य बात है)

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5 Responses to Yeh Jo Desh hai tera…….

  1. નિરાલી says:

    N here is one remix from me..

    नेता की मत मानियो रे,
    नेता की मत सुनियो..
    नेता ठग लेंगे.. ठग लेंगे.. नेता ठग लेंगे.. 😉

  2. very nice remix and in line and ‘spirit’ of the story..

  3. Anjali says:

    Very

    बेईमानी से ही बनते हैं बंगले बाग बगीचे,
    मेहनत से बने न कुटीया –अरे छोडो बात मकान की…

    wow…!!! Absolutely true…

  4. shabnam khoja says:

    Vry true….
    n nice remix….बेईमान सबसे आगे और दुनिया पीछे पीछे …..
    nw a days this only happends in our country….

  5. હાર્દિક પીઠડીયા says:

    very true and touching thought sir….
    atyar ni paristhiti nu khubaj saras rite vyakt karya 6e…..
    and its the crnt situtn of india….
    btw nice thought as alws….

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